Ads

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

Ek raat me kitni baar sambandh bnane chahiye / एक रात में कितनी बार शारीरिक संबंध बनाने चाहिये

Ek raat me kitni baar sambandh bnane chahiye

 

 

 

एक रात में कितनी बार शारीरिक संबंध बनाने चाहिये


कुछ लोग मानते है कि एक रात में एक से ज्यादा बार संबंध बनाने से ही औरत को संतुष्टि मिलती है। वास्तव में इस धारणा को बनाने में आदमी का ही दोष है। आदमी समय से पहले ही तथा औरत को संतुष्ट किये बिना ही झड जाता है। और औरत के कोई फर्क नहीं पडता। वह तो सूखी की सूखी ही रहती है। तो उसे संतुष्ट करने के लिये एक ही रात में आदमी को दुबारा संबंध बनाना पडता है। और दूसरे संबंध के बाद ही औरत को संतुष्टि मिलती है।
वास्तविकता यह है कि इसमें ज्यादा या कम लगने वाले समय से मतलब नहीं है। औरत को संबंध बनाने के पहले राउंड में ही संतुष्ट किया जा सकता है। लेकिन इसके लिये आदमी का संबंध बनाने में एक्सपर्ट होना चाहिये। संबंध बनाने में जरूरत से ज्यादा समय भले ही लग जाये, लेकिन कम समय में पूरा नहीं होना चाहिये। अन्यथा औरत के सामने लज्जित होना पडेगा। और दूसरे राउंड की तैयारी करनी पडेगीं। 

यह भी पढेंः- मर्द के छूने से औरत के बदन में होती है ऐसी गुदगुदी

रोमांस शुरू करते ही तुरंत औरत के विशेष अंग को मसलना नहीं चाहियें। जिस तरह से छत पर पहुंचने के लिये एक एक सीढी चढनी होती है। उसी तरह औरत की कामवासना जगाने के लिये और उसे चरम पर पहुंचाने के लिये धीरे धीरे शुरू करके फिर अंतिम पर पहुंचना चाहिये। स्त्री के कौनसे अंग को पहले और कौनसे अंग को बाद में छेडना चाहिये। यह समझना ज्यादा मुश्किल नही है। आप यह जान लें कि उसके गुप्त अंग को सबसे बाद में छेडना चाहियें। उसके अलावा सभी अंगों से पहले ही खेलना, मसलना, चूमना, काटना तथा थपथपाना चाहिये। इससे धीरे धीरे उसकी कामवासना जाग कर संबंध बनाने की इच्छा पर पहुंच जायेगीं।

 यह भी पढेंः- अंग के ढीलेपन और शीघ्रपतन से राहत दिलाते है कौंच के बीज

वैसे सामान्य रूप से यह कोई नियम नहीं बना हुआ है कि एक रात में कितनी बार संबंध बनाये जायें। इसमें कोई बंधन नहीं है। संबंधों के प्रति उत्तेजना समाप्त होने के बाद जल्दी उत्तेजित होने वाली औरत को एक सामान्य संबंध क्रिया से ही संतुष्ट किया जा सकता है। यदि संबंध बनाने की शुरूआत में उसके शरीर की अच्छी तरह से मालिश, उसके अंगों को चूमना, काटना, उसे कस कर अपनी बाहों में पकडना, आदि किया जाये तो जल्दी ही उसे पहले राउंड में संतुष्ट किया जा सकता है। 

यह भी पढेंः- संबंध क्षमता बढाये शतावरी

संबंध किस उम्र तक बनाये जाये, यह भी निश्चित नहीं है। मासिक बंद हो जाने के बाद तो गर्भ ठहरने का डर भी समाप्त हो जाता है। तो बिना किसी संकोच के प्रेम संबंध बना  सकते है। कई बार तो मासिक आना बंद होते ही औरत में कामवासना का एक ज्वालामुखी सा फूटता है। जो धडाधड संबंध बनाने से ही शांत होता है। उस समय तो उसे वाइल्ड अर्थात जंगली और वहशी तरीके से संबंध बनाना पसंद होता है। फिर संबंधों में वह कोमलता उसे पसंद नहीं आती। जो नई नई कच्ची कली होती है। तब चाहिये होता है। 

यह भी पढेंः- अश्व की शक्ति देती अश्वगंधा। आजमाएं इस तरह

मासिक बंद होने के बाद तो वह अपने प्रेमी से खुलकर संबंध बनाने के लिये बोलती है। उस समय उसे किसी भी तरह की शर्म नहीं होती। उसे सिर्फ अपनी इच्छा पूर्ति से मतलब होता है। फिर तो वह स्वयं आदमी को नीचे पटक कर उसके उपर चढ जाती है। खुद ही उसके अंग को अपने हाथों और होठों से मालिश करके खेलती रहती है। और जब चाहती है तब अपनी गुफा में डाल लेती है। और जब चाहती है तब अपने मुख में लेकर गुदगुदाने  लगती है। वास्तव में संबंध बनाने का आनंद ही उसी समय आता है। जब औरत अपनी इच्छा से सभी कार्य स्वयं करती है। उसे मानने में समय खराब नहीं होता है।  

Read More

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

Mard ke chhune se aurat ke badan me hoti hai esi gudgudi / मर्द के छूने से औरत के बदन में होती है ऐसी गुदगुदी

 Mard ke chhune se aurat ke badan me hoti hai esi gudgudi

 

मर्द के छूने से औरत के बदन में होती है ऐसी गुदगुदी:-


ऽ    मर्द जब संबंध बनाने के लिये उत्तेजित हो और औरत को पकडकर खींच कर अपनी बाहों में भरकर अपने सीने से लगा लेता है तो इससे औरत का दिल जोरों से धडकने लगता है। 

यह भी पढ़िये - अंग के ढीलेपन और शीघ्रपतन से राहत दिलाते है कौंच के बीज

ऽ    अपने सीने से लगाकर अपने होंठ, औरत के होंठों पर रखने से औरत के बदन में आश्चर्यजनक रोमांच पैदा हो जाता है। उस रोमांच की अनुभूति करने के लिये वह अपनी आंखें बंद कर लेती है और अपना सिर मर्द की छाती पर टिका देती है। 


ऽ    औरत के गालों पर चुंबन देने से तथा उसके बालों को सहलाने से वह मर्द के पे्रम सागर में डूबने लगती है। उसकी तरफ सम्मोहित होकर उसके नियंत्रण में आने लगती है। 

यह भी पढ़िये - संबंध क्षमता बढाये शतावरी

ऽ    जब मर्द का हाथ उसके वक्षस्थल पर पहुंचता है तो उस समय उसे होश आता है। और वह उसके नियंत्रण से थोडा बाहर आती है। वक्षस्थल के आगे वाले हिस्से पर मर्द का हाथ लगते ही औरत के पूरे शरीर में बिजली का करंट सा दौडता है। उपर से लेकर नीचे तक औरत झनझना जाती है। उसका दिल तेजी से धडकने लगता है। श्वास और नसें तेजी से चलने लगती है। शरीर भटटी की तरह तपने लगता है। चेहरा लाल हो जाता हैं और वह मर्द से चिपक जाती है। 

यह भी पढ़िये - अश्व की शक्ति देती अश्वगंधा। आजमाएं इस तरह

ऽ    थोडी देर औरत के कोमल और भरे भरे वक्ष को सहलाने के बाद उसे अपने शरीर से चिपकाये हुये धीरे धीरे उसके सारे शरीर को अपने हाथ से उसके पेट, कमर,  जांघें,  आदि को सहलाने, मसलने, चुंबन देने से, गुप्त द्वार को अंगुलियों से हिलाने, सहलाने से औरत का शरीर पिघलने लगता है और कांपनें लगता है। 


ऽ    थोडी देर  गुप्त द्वारों पर अंगुलियों से हल्की हल्की मालिश करने के बाद थोडा जोर लगाकर रगडने से औरत अपनी शर्म, संकोच और झिझक को भूलकर अनियंत्रित हो जाती है। और मर्द से चिपक जाती है मानो जैसे वह उसके शरीर में ही प्रवेश करना चाहती है। मर्द को कस कर पकड लेती है। तथा अपने कोमल, गुलाबी होंठों से मर्द के गाल, गर्दन, होंठ आदि को चूमने लगती है। साथ ही अपने होठों को आदमी की छाती पर रगडने लगती है। इस तरह प्यार करने से उसकी सांसें तेजी से चलने लगती हैं। वह अपनी टांगों से आदमी की टांगों, जांघों  को दबाने लगती है। 


ऽ    औरत अधिक उत्तेजित होने पर अथवा उसी मर्द के साथ पहले संबंध बनाये हुये होने पर अर्थात मर्द से खुले हुये होने पर वह उसके गुप्त अंग को अपने हाथ में पकडकर खेलने लगती है, उसे चूमने लगती है या अपने मुख में लेकर चूसने लगती है। इस क्रिया से औरत और मर्द दोनों को ही शारीरिक संतुष्टि के साथ मानसिक संतुष्टि भी मिलती है। दोनों की आत्मा तृप्त हो जाती है। दोनों के चेहरे पर संतुष्टि के भाव झलकने लगते है।
ऽ    उसकी यह क्रिया मर्द को संकेत होती है कि वह अपने हथियार को उसकी गुफा में प्रवेश कराकर जल्द से जल्द क्रिया आरंभ करें। 


ऽ    क्रिया में संतुष्टि मिलने पर मर्द के लिये औरत के मन में और भी अधिक प्रेम और सम्मान बढ जाता है।
 

Read More

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

Ang ke dhilepan or shigrhapatan se rahat dilate hai konch ke beej / अंग के ढीलेपन और शीघ्रपतन से राहत दिलाते है कौंच के बीज

Ang ke dhilepan or shigrhapatan se rahat dilate hai konch ke beej 

 

 

अंग के ढीलेपन और शीघ्रपतन से राहत दिलाते है कौंच के बीज


कौंच के बीजों को वानरी, आत्मगुप्त, कपिकच्छू और केवांच आदि नामों से भी जाना जाता है। यह लता जाति की वनस्पति है। इस पर बहुत ही सूक्ष्म रोम होते है। यह वर्षा के बाद उत्पन्न होती है। यह गांव के बाहर बागों में और जंगलों में किसी झाडी या वृक्ष पर फैली होती है। इसके सूक्ष्म रोमों के कारण इसके मनुष्य के शरीर पर छूने से खुजली और जलन होने लगती है। खुजली के साथ दाह और शोध भी होने लगता है। इसमें सेम के आकार की फली लगती है। जिसमें पांच से छः काले और चमकीले रंग के बीज लगते है। इसकी बाहरी काली परत को हटा दिया जाता है और अंदर के सफेद बीजों का उपयोग किया जाता है। इसे ताकत के रूप में लिया जाता है। कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते है। इस की पत्तियों, बीजों और शाखाओं का उपयोग दवा के रूप में किया जाता है।

 ज्यादातर कौंच का उपयोग लंबे समय तक संभोग करने की क्षमता प्राप्त करने के लिये किया जाता है।
प्रमुख रूप से पुरूषों के यौन अंग की शिथिलता, वीर्य का पतला होना, शीघ्रपतन की समस्या को दूर करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में इसे यौन क्षमता बढाने वाली दवा के रूप में मुख्य रूप से ग्रहण किया जाता है। इसके अलावा मांसपेशियों में खिंचाव, गैस, दस्त, खांसी, गठिया, दर्द, शुगर, टीबी तथा मासिक धर्म की परेशानी में भी कौंच के बीजों का उपयोग किया जाता है। तनाव, चिंता, तंत्रिका तंत्र की परेशानी, पार्किसंस रोग, कोलेस्टोल, तथा ब्लडशुगर के रोगों में भी कौंच के बीजों का उपयोग किया जाता है। मानसिक सुदृढता के लिये यह प्रमुख औषधी है। 


कौंच बीज के यौन संबंधी फायदेः-

यह एक बहुत अच्छा कामोद्दिपक है। यह जनन अंगों की शिथिलता दूर करके उनमें उत्तेजना पैदा करता है। उनके उत्तक तत्वों को सवंर्द्धित करता है। पुरूषों में शुक्राणुओं को बढाता है तथा गर्भवती महिलाओं में दूध को बढाता है। वक्ष स्थल को कठोर, सुदृढ और मजबूत बनाता है। उनका आकार बढाता है। स्त्री की ढीली योनि की मांसपेशियों में कसावट लाकर उसे छोटी करता है। कमजोरी और अक्षमता को दूर करता है। तंत्रिकाओं को शांत करता है। संभोग शक्ति को बढाने के लिये इसके बीजों का पाउडर बनाकर उपयोग किया जाता है। इससे वीर्य वृद्धि होती है और संभोग की इच्छा बढाती है। यौनांग का ढीलापन दूर होता है। इसके साथ ही शीघ्रपतन रोग का निवारण होता है। 


सावधानीः-

कौंच के बीजों का उपयोग करने के दौरान तेज मिर्च मसाले और तली हुई व खट्टी चीजों से परहेज करना चाहिये। इनका सेवन नहीं करना चाहिये। 


प्रयोग का तरीकाः-

इसके बीजों को पीसकर पाउडर बना लें और दूध में चीनी के साथ पकाकर खीर बनाकर सेवन करे। इसके बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनका छिलका हटाकर इनको सुखा देना चाहिये। सूखने के बाद पीसकर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिये। इस चूर्ण का लगभग पांच - पांच ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के साथ दूध में मिलाकर सेवन करना चाहिये। 


सौ ग्राम कौंच के बीज और सौ ग्राम तालमखाना को कूटपीसकर चूर्ण बना ले। फिर इसमें दो सौ ग्राम मिश्री पीसकर मिला लें। हल्के गर्म दूध में आधा चम्मच चूर्ण मिलाकर रोजाना पीना चाहिये। दूध व चीनी के साथ इसे काढे के रूप में भी लिया जा सकता है। 


शीघ्रपतन और वीर्य की कमी जैसी समस्याओं में कौंच के बीज, सफेद मूसली, और अश्वगंधा के बीजों को समान मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना ले। इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा सुबह और शाम एक कप दूध के साथ लेना चाहिये।
 

Read More

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

Sambandh shamta badhaye Shatavari / संबंध क्षमता बढाये शतावरी

Sambandh shamta badhaye Shatavari

 

 

संबंध क्षमता बढाये शतावरी


 पुरूषों की संबंध बनाने की क्षमता और स्त्रियों के शरीर को पुष्ट करने वाली औषधी है शतावरी।
आयुर्वेद में शतावरी का अर्थ है - जिसके सौ पति हो। नाम के अनुरूप ही इसका उपयोग करने वालों को यह भरपूर शक्ति प्रदान करती है। जिस तरह पुरूषों के लिये अश्वगंधा है। उसी तरह स्त्रियों के लिये शतावरी का महत्व है। हालांकि इन दोनों ही औषधियों के अच्छे प्रभाव स्त्री व पुरूष दोनों पर ही पडते है। इसके अतिरिक्त यह हर उम्र की औरतों के लिये लाभदायक है। इसमें बहुत सारे फाइटो हार्मोन होते है। जो कि स्त्रियों के शरीर में स्थित हार्मोन के समान होते है। 


शतावरी एक औषधिय पौधा है, जिसकी जडों को अमृत का स्थान दिया गया है। शतावरी स्वाद में कडवी होती है। लेकिन पोषक तत्वों से भरी होती है। शतावरी को शतावरी, शतावर, सतमुली, शटमूली, सरनाई, आदि के नाम से भी जाना जाता है। यौन संबंधी उपयोग के अलावा इससे शुगर, वजन घटना, तथा त्वचारोग में भी आराम मिलता है। इसमें बहुत कम कैलोरी होती है। एक कप शतावरी में केवल 20 केलोरीज होती है। इसका अर्थ है कि आप इसका सेवन करते समय कैलोरी की चिंता करना भूल जाइये। इसमें 93 प्रतिशत पानी होता हे। इसमें फाइबर की मात्रा अधिक होती है। ज्यादा फाइबर खाने से वजन कम होता है। 


शतावरी के यौन संबंधी गुणः-

पुरूषों में संभोग इच्छा को जागृत करती है। नपुंसकता को समाप्त करती है। महिलाओं के स्तन का आकार बढाती है तथा छाती की मांसपेशियां बढाती है। संभोग जीवन का अनुभव आनंददायक बनाती है। शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा को बढाती है। मर्दाना ताकत बढाती है। स्त्रियों के प्रजनन अंगों के लिये एक सुदृढ औषधी है। यह प्रजनन अंगों के लगभग सभी विकारों को दूर करती है। यह एस्ट्रोजन हार्मोन के उत्पादन को बढाती है तथा मासिक चक्र को नियमित करती है। पुरूषों में शुक्राणुओं की संख्या बढाती है। शुक्राणुओं की गुणवत्ता और गतिशीलता में सुधार लाती है। यौन स्वास्थ्य समस्याओं में प्रभाव के कारण पैदा हुये बांझपन को दूर करती है। गर्भवती औरतों के लिये उत्तम औषधी है। गर्भ को पोषित करती है। गर्भवती औरत के अंगों को गर्भ धारण के लिये तैयार करती है। गर्भपात से बचाती है। मां के दूध को बढाती है। उसकी गुणवत्ता को बढाती है। शतावरी औरतों में मासिक धर्म चक्र के दौरान बढे हुये वजन को कम करती है। 


उपयोग में सावधानीः-

यदि अन्य रोगों की कोई दवाएं चल रही हो तो आपको शतावरी नहीं लेनी चाहिये। क्योंकि यह उन दवाओं को काम नहीं करने देगी। अधिक मात्रा में शतावरी का सेवन करने से दिल व गुर्दा रोग होने की संभावना हो जाती है। शतावरी में कार्बोहाइडेªट होता है। जिसे रेफिनोज कहते है। इसे पचाने के लिये पेट में इसका खमीर बनता है। इस क्रिया के दौरान गैस बनती है। जो शरीर से बाहर निकलती है। गर्भावस्था में सामान्य से अधिक मात्रा में शतावरी खाना हानिकारक हो सकता है। जिन्हें प्याज या उसके किसी प्रकार से संक्रमण है, उन्हें शतावरी से भी हानि हो सकती है। इस औषधी में प्यूरीन नामक पदार्थ पाया जाता है। शरीर में प्यूरीन, यूरिक एसिड बनाने के लिये टूटता है। जिससे शरीर में प्यूरीन अधिक हो सकता है। जिन लोगों को यूरिक एसिड की समस्या है, जैसे किडनी में पथरी, या गाउट, उन्हें शतावरी नहीं खानी चाहिये।
 

Read More

सोमवार, 18 जनवरी 2021

Ashva ki shakti deti ashvagandha. Ajmaye is tarah \ अश्व की शक्ति देती अश्वगंधा। आजमाएं इस तरह

 Ashva ki shakti deti ashvagandha. Ajmaye is tarah

 
 
 

अश्व की शक्ति देती अश्वगंधा। आजमाएं इस तरह


अश्वगंधा एक आयुर्वेदिक औषधि है। जो घोडे के समान शक्ति देने वाली मानी जाती है। इसे अश्वगंधा का शाब्दिक अर्थ है घोडे की गंध। इसकी ताजा पत्तियों तथा जडों में घोडे के मूत्र की गंध आने के कारण ही इसका नाम अश्वगंधा पडा। वैश्विक स्तर पर प्रयोग की जाने वाली यह औषधि है। 

ALSO READ - वाजीकरण के समय खानपान कैसा हो, जानिए इस लेख में  


भारत में अश्वगंधा का उत्पादन राजस्थान और मध्यप्रदेश में सूखी भूमि पर किया जाता है। राजस्थान के नागौर की अश्वगंधा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। चीन तथा कोरिया में भी इसका उत्पादन होता है। यह एक आधारभूत जडी बूटी है। आयुर्वेदिक दवा अश्वगंधादि लेह और अश्वगंधारिष्ट में यह प्रमुख रूप से पाई जाती है। 


अश्वगंधा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाती है। रक्तचाप सही रखता है। तनाव कम होता है। कोलेस्ट्रोल को घटाती है। पाचन क्रिया सही रखती है। नींद अच्छी आती है। टीबी अर्थात तपेदिक के रोग में आराम देती है। जडों के पाउडर का प्रयोग खांसी और अस्थमा को दूर करने के लिये भी किया जाता है। जडों को त्वचा संबंधी रोगों के निदान हेतु भी प्रयोग किया जाता है। इसमें एंटी ट्यूमर और एंटी बायोटिक गुण भी पाया जाता है। तंत्रिका तंत्र संबंधी कमजोरी को भी दूर करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है। गठिया और जोडों के दर्द को ठीक करने के लिये भी इसका प्रयोग किया जाता है। 

ALSO READ - कामशक्तिवर्धक स्वादिष्ट व्यंजन, जो देते है मर्दाना जोश। क्लिक करके जानिए, आपके लिये कौनसा है ?

अश्वगंधा के यौन जीवन में लाभः-
यह शरीर की उत्कंठा, बेचैनी व घबराहट को शांत करती है। शरीर की गं्रथीय ओर यौन कार्यप्रणाली, दमखम और उर्जा को पुनर्जीवित करती है। आयुर्वेद में इसे पुरूषों के लिये जीवनभर उपयोग करने का सुझाव दिया जाता है। यौन क्षमता बढाने के साथ ही शुक्राणुओं की संख्या भी बढाती है। इसकी जड शक्तिवर्धक, शुक्राणुवर्धक, तथा शरीर को पुष्ट करने वाली होती है। शरीर को बलवान बनाती है। इससे आलस्य नहीं रहता। संबंध बनाने के दौरान थकान नहीं होती। स्त्री रोग जैसे श्वेत प्रदर, अधिक रक्तस्त्राव, गर्भपात आदि में लाभकारी है। स्त्रियों की प्रजनन क्षमता बढाती है। शरीर में आयरन की कमी को पूरा करती है। 

ALSO READ - स्त्री पुरूष दोनों के लिये एक ही शक्तिदायक नुस्खा। जो जगाए दोनों में जोश।

उपयोग के दौरान सावधानियांः-
अश्वगंधा के अधिक सेवन से पेट में गैस, दस्त आदि की समस्या हो सकती है। आंतों को नुकसान हो सकता है। अधिक सेवन से नींद ज्यादा आती है। सीमा से अधिक सेवन करने से नींद आनी बंद हो जाती है। इसलिये अश्वगंधा का सेवन एक निश्चित सीमा तक करना चाहिये। 

ALSO READ - धातु पुष्ट करते है ये घरेलू आयुर्वेदिक मिश्रण।

यदि किसी अन्य रोग की दवा ले रहे है तो फिर अश्वगंधा का सेवन नहीं करना चाहिये। क्योंकि अश्वगंधा फिर शरीर में अन्य किसी दवा को लगने नहीं देती है। इससे शरीर का तापमान बढता है। ज्यादा सेवन से बुखार होने की समस्या हो सकती है। इसलिये इसे गर्मी में नहीं लेना चाहिये। 

ALSO READ - शारीरिक दुर्बलता नाशक कुछ घरेलू उपाय।

प्रयोग का तरीकाः-
घोडे जैसी शक्ति प्राप्त करने के लिये अश्वगंधा की जड के पाउडर का प्रयोग किया जाता है। इसके पाउडर का एक चम्मच रोजाना गर्म दूध के साथ लेना चाहिये। अश्वगंधा चूर्ण तथा बिदारीकंद को सौ सौ ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना ले। चूर्ण को गर्म दूध के साथ लेना चाहिये। इससे वीर्य ताकतवर बनता है तथा शीघ्रपतन की समस्या से निजात मिलती है।
 

Read More

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

Elaychi ke fayde / इलायची के फायदे

 Elaychi ke fayde

 

 

इलायची के फायदे 


इलायची दो प्रकार की होती है। एक छोटी और दूसरी बडी। छोटी इलायची का प्रभाव समशीतोष्ण होता है (अर्थात न अधिक गर्म और न अधिक सर्द )। दिमाग, दिल और शरीर को बल देने वाली है। जी मिचलाना, उल्टी, दमा, खंासी, हिचकी, कफ और कब्ज के लिए गुणकारी है। मूत्र की जलन को दूर करती है, मूत्र को खोलती है, अर्थात मूत्र की कमी को ठीक करती है, मेदे के बेकार क्षरित रस को खुश्क करती है, मन प्रसन्न हो उठना है, फेफडों को बल मिलता है, पथरी की शिकायत को दूर करती है, पान के साथ खाई जाती है। बडी इलायची प्रभाव से गर्म और कुछ कब्ज करने वाली होती है, पसीना लाती है, स्फूर्तिदायक है और छोटी इलायची के गुणों के बराबर है। यह गर्म मसाले में डाली जाती है, दवाई के तौर पर भी उपयोग की जाती है ।


प्यास की तीव्रता- यदि प्यास अधिक लगती हो तो चार किलो पानी मे तीस ग्राम छिलके उबालो। जब पानी लगभग आधा रह जाए तो ठण्डा करके उपयोग में लाए, रामबाण इलाज है ।


पाचनवर्द्धक - इलायची के बीज, सौंफ और जीरा -सब बराबर वजन (पन्द्रह-पन्द्रह ग्राम) तनिक भून लें। भोजन के पश्चात् चम्मच-भर उपयोग करें।
दूसरा योग- इलायची के बीज, सोंठ, लोंग और जीरा- सब पन्द्रह पन्द्रह ग्राम। अगल-अलग पीसकर सबको भली प्रकार मिला लें।


हैजा की रामबाण चिकित्सा- बडी इलाइची, खुश्क पोदीना, खसखस, नागरमोथा।  प्रत्येक पचहत्तर ग्राम। जायफल और लौंग प्रत्येक नब्बे ग्राम।
सबको कूट-पीस कर तीन किलो पानी में उबालें । पानी जब आधा रह जाए तो उतार कर छान लें और किसी मिट्टी के नई बर्तन या तांबे के बर्तन में भर लें। बर्तन का मुंह खुला रहने दें, ताकि भाप निकल कर पानी ठण्डा हो जाए । बर्तन को हर तीसरे दिन किसी खटाई से साफ कर लें। हैजे के रोगी को दिन मे कई वार सेवन कराए ।


शरद् ऋतु की खांसी- दाना वडी इलायची, काली मिर्च, पिपली वड़ी, गिरी वादाम, मुनक्का (वीज निकाल कर) पन्द्रह-पन्द्रह ग्राम। गिरी। वादाम ठण्डे पानी में भिगो कर छिलका उतार दें। अब सब चीजो को कूडी में खूब घोटें, जितना अधिक घोटा जाएगा, दवाई उतनी ही अधिक लाभ करेगी। यदि सख्त हो तो पानी से तर कर सकते हैं। जब गोली बनाने योग्य हो जाए तो जंगली वेर के बराबर गोलियां लें। रात्रि समय एक गोली मुंह में रख कर रस चूसें।


प्रमेह- प्रमेह को दूर करने वाला इससे वढिया नुस्खा आपको शायद ही कही मिलेगा । साधारणत प्रमेह की जितनी भी औषधियाँ हैं उन सवसे कब्ज हो जाती है, और कब्ज की हालत में यह रोग और भी बढ जाता है । परन्तु इस चूर्ण में यह गुुण है कि इसके सेवन से कब्ज विल्कुल नहीं होती। इसके अतिरिक्त यह चूर्ण प्रभाव मे न अधिक गर्म है और न अधिक सर्द । वीर्य की कमी को घटाता और इसके पतलेपन को दूर करता है। इससे सेवन से वीर्य पर्याप्त मात्रा मे पैदा होता है । नुस्खा निम्नलिखित है--
दाना वडी इलायची, दाना छोटी इलायची, असगंध नागोरी, तज कलमी, सालव, तालमखाना- सव वरावर वजन बहुत वारीक पीस लें और कुल वजन - के वरावर मिश्री पीस कर मिलाएं।
सेवन-विधि- नौ ग्राम से बारह ग्राम तक प्रात दूध के साथ उपयोग करें।


मूत्र-जलन और नया सूजाक- सात बादाम गिरी (छिलका रहित), छोटी इलायची सात दाने-आधा किलो पानी में खूब घोंट-छान कर मिश्री मिलाकर दिन में तीन बार पिलाएँ। कुछ दिन में आराम होगा, रामवाण है। यदि इसमें धनिया और सदल का बुरादा प्रत्येक पांच ग्राम मिला लिया जाए तो और भी अधिक गुणकारी है।


हिचकी- दाना वडी इलायची (तनिक भुना हुग्रा ) पांच ग्राम बारीक पीस कर इसमे दो तोले चीनी मिलाएँ। एक-दो वार गर्म पानी के साथ सेवन करने से हिचकी दूर हो जाती है ।

Read More

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

Adrak ke fayde / अदरक के फायदे

 Adrak ke fayde

 

अदरक के फायदे


अदरक प्रायः दाल, साग-सब्जी, दूध, चाय, काफी और चटनी में इस्तेमाल होता है। सूख जाने पर यह सोंठ कहलाता है। सूखने पर भी इसके गुणों में रत्ती भर भी कमी नहीं आती।  अनेक रोगों में इसका उपयोग निम्नलिखित ढंग से किया जाता है-


खांसी- दमा- 

 साठ ग्राम अदरक के रस में साठ ग्राम मधु मिलाकर तनिक गर्म करके पी लें । सात दिन में आराम होगा।


भूख न लगना-

भूख ठीक तरह न लगती हो, पेट में वायु भर जाती हो, कब्ज रहती हो तो अदरक को काट कर बहुत वारीक टुकडे कीजिये और नमक छिड़क कर एक दो ग्राम खाए। भूख अच्छी तरह लगेगी, वायु का निकास होगा और कब्ज खुलेगी।


पाचनवर्द्धक चूर्ण- 

पाचन विकार ठीक करता है, मदाग्नि बढाता है, वायु पीडा और खट्टी डकारों में लाभदायक है। सोठ और अजवायन आवश्ययकतानुसार नीबू के इतने रस में डालें कि दोनो चीजें तर हो जाए। इसे छंाव मे खुश्क करके पीस लें और थोड़ा-सा नमक मिलाकर सुरक्षित रखें। दोनो समय चार रत्ती से एक ग्राम तक पानी के साथ सेवन करें।


कान-दर्द- 

अदरक का रस पांच ग्राम, मधु दो ग्राम, सेंधा नमक एक रत्ती, तिल्ली का तेल दो ग्राम। पहले नमक और अदरक का रस मिला लें। फिर सब मिलाकर अच्छी तरह हिलाए । थोडा गर्म करके सात-आठ वूंद कान में डालें, कान का दर्द बंद होगा।


इंफ्लुएजा- 

सोंठ  चूर्ण पचास ग्राम, चूर्ण पिपली पच्चीस ग्राम और चूर्ण काकटा सीगी डेढ-सौ ग्राम-् सब मिला लें। इफ्लुएजा की खंासी को रोकने के लिए एक से दो ग्राम तक यह चूर्ण थोडे मधु के साथ चटाए ।


आवाज बैठना--

 अदरक का रस मधु में मिलाकर चाटना चाहिए। 


नजला-जुकाम-

 अदरक छीलकर बारीक-बारीक काट लें और कडाही मे घी डालकर इसमे भूनें। तत्पश्चात् अदरक को बराबर वजन की चाशनी में डालें और पकाए । जब खूब पक जाए तो सोठ, सफेद जीरा, काली मिर्च, नाग केसर, जावित्री, बडी इलायची, तज, पतरज, पीपल, बनिया, काला जीरा, पीपलामोल और वावटिंग-प्रत्येक अदरक का बारहवां भाग लेकर कूट-छानकर मिलाए ।

सेवन-विधि- आठ ग्राम से लेकर पन्द्रह ग्राम तक सेवन करें। जुकाम व नजले में गुणकारी है । ठण्ड के कारण आवाज बैठ जाए तो इसे खोलती है, दम फूलने की शिकायत इसके सेवन से दूर हो जाती है, भूख खूब लगती है, पेट के दर्द और वायु के लिए लाभकारी है।


पसली का दर्द-

सोंठ तीस ग्राम मोटी-मोटी कूटकर तिहाई किलो पानी में आधे घंटे तक पकाए और छान लें। तीस-तीस ग्राम यह काढा तीन तीन घंटे पश्चात् चार बार पिलाए पसली के दर्द का यह सास इलाज है।
संग्रहणी, मरोड, बदहजमी-चूर्ण सोठ पचास ग्राम, चूर्ण सौंफ पचास ग्राम, चूर्ण हरड पचास ग्राम, चीनी पिसी हुई डेढ सौ ग्राम ।


बदहजमी के दस्त, संग्रहणी, मरोड और पाचन की कमजोरी मे एक से तीन ग्राम तक दिन में दो बार दें।


इस प्रकार सामान्य सी दिखने वाली अदरक के इतने मूल्यवान गुण है। जिसकी कोई सीमा नहीं है। जीवन के लगभग प्रत्येक छोेटे रोग से लेकर प्राण लेने वाले बडे - बडे रोग अदरक द्वारा ठीक किये जा सकते है। इसलिये डाक्टरों के बडे बडे खर्चों से बचकर घर में अदरक का प्रयोग कीजिये और अपने परिवार को स्वस्थ रखिये।  
 

Read More

long ke fayde / लौंग के फायदे

long ke fayde

 

 

लौंग के फायदेः-


पूरी दुनिया में मसालों के रूप में लौंग का प्रयोग किया जाता है। साथ ही रोगों की औषधी के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा यह पूजा पाठ आदि धार्मिक कार्यों में बढचढ कर हिस्सा लेती है। देखा जाये तो इसके बिना मानव जीवन का कोई भी पारिवारिक, धार्मिक कार्य पूर्ण नहीं होता। इसकी सुगंध से मन महक जाता है। 


लौंग व उसका तेल एंटी आक्सीडेंट, कवकरोधी, जीवाणुनाशक, वायरलरोधक, सेप्टिकरोधक, होता है। लौंग में लगभग 36 विभिन्न प्रकार के तत्व होते है। जिनमें यूगेनाल प्रमुख होता है। इसके अलावा पोटेशियम, सोडियम, मैग्निशियम, कैल्शियम, ओमेगा 3 फैटी एसिड, विटामिन के और सी, आयोडीन, फाइबर आहार, मैंगनीज, लोहा, फास्फोरस, आदि होता है। 


चिकित्सा प्रणाली में लौंग के सूखे फूल की कलियां व पत्ते के साथ तेल भी व्यापक रूप से चिकित्सा औषधी के रूप में काम आता है। साबुत लौंग व इसका तेल बाजार में आसानी से उपलब्ध होता है। 


पेट फूलना - 

पेट में  जब वायु जमा होकर पेट फूलने लगे तो लौंग का निम्नलिखित अर्क तैयार करके उपयोग करें, लाभ होगा।


लौंग का चूर्ण दस रत्ती और खौलता हुआ पानी आधा कप । जब लौंग चूरण अच्छी तरह भीग जाए तो छान लेना चाहिए। रोजाना तीन बार सेवन करें।


बदहजमी- 

बदहजमी की शिकायत होने पर चूर्ण लौंग दस रत्ती तथा खाने का सोडा दस रत्ती आधा कप उबलते हुए पानी में मिलाकर सेवन करें।


जुलाब- 

यदि जुलाब लेना हो तो लौंग पन्द्रह रत्ती, सोंठ पन्द्रह रत्ती, सनाय तीस ग्राम और उबलता हुआ पानी चैथाई किलो । कम-से-कम एक एक घंटा तक इस घोल को रखा रहने दीजिए, तत्पश्चात् छान लीजिए और तनिक गरम करके उपयोग कीजिए।


खांसी और दमा- 

रात को सोते समय आठ या दस कच्चे या भुने हुए लौंग खाने से आराम हो जाता है ।


बुखार और सिर-दर्द- 

लौंग और चैरेता-दोनों पन्द्रह-पन्द्रह ग्राम को आधा किलो पानी मे पकाइये। जव पानी आंठवां भाग रह जाए तो उतार लीजिए। मलेरिया बुखार के रोगी को बुखार उतरने पर पिलाने से आराम हो जाता है। सिरदर्द की हालत मे चार-पांच लौंग पानी मे पीसकर लगाने से तुरन्त लाभ होता है।


इफलुएंजा-

 सर्दी लगकर बुखार आने पर, यानि इफ्लुएजा, के लिए निम्नलिखित नुस्खा सर्वोत्तम है
पांच लौंग, सोठ चूर्ण पन्द्रह रत्ती, दालचीनी तीस रत्ती। आधा किलो पानी में पन्द्रह मिनट तक उबालकर उपयोग मे लाइये ।


मितली आना-

 चाहे किसी कारणवश मितली आ रही हो, छ लौंग चबा लीजिए, आराम होगा।
हिचकी- हिचकी आने पर दो लौंग मुंह में डालकर चूसने से तुरन्त आराम हो जाता है ।
दूसरा योग- चार ग्राम छोटी इलायची, पांच लौंग, दोनों को थोडे से पानी में पीसकर तथा छानकर तथा पन्द्रह ग्राम मिश्री मिलाकर पिलायें, हिचकी आना बन्द होगी।


प्यास की तीव्रता- 

पानी को उबाल लीजिए। उबलते समय उसमें दो लौंग डाल दीजिए, हम पानी को तांवंे के बर्तन में रखे और ठण्डा होने पर रोगी को पिलाए, एक-दो दिन में ही आराम हो जायेगा ।


दांत दर्दः- 

रूई के फोहे में लोंग का थोडा तेल लगाकर प्रभावित दांत पर लगाये और उससे जुडा जो मसूडा है, वहां लोंग के तेल की थोडी मालिश भी करे। इसके अलावा दो लोंग पीसकर उसमें जैतून का तेल मिलाकर उस मिश्रण को दर्द वाले स्थान पर लगाये। तुरंत आराम हो जायेगा।  
 

Read More

बुधवार, 6 जनवरी 2021

Dhaniya ke fayde / धनिया के फायदे

Dhaniya ke fayde  


धनिया के फायदे


मूत्राशय की जलन- 

खुश्क धनिये की गिरी और कूजा मिश्री दोनों तीन-तीन सौ ग्राम।


बनाने की विधि- खुश्क धनिया लेकर मोटा-मोटा कूट कर इसका छिलका अलग करें और बीजों के अन्दर की गिरी ले लें-इस नुस्खे में यही गिरी तीन सौ ग्राम चाहिए । साधारणत साढे-चार सौ ग्राम धनिया में तीन-सौ ग्राम गिरी निकल पाती है। यदि कूजा मिश्री न मिले तो उसके स्थान पर तवी की मिश्री, देशी चीनी या दानेदार चीनी नुस्खे मे शामिल कर लें, इससे दवा के प्रभाव में कोई अन्तर नही पडेगा।


दोनो वस्तुआंे को अलग-अलग पीस कर आपस में मिला लें।
लाभ- यह औषधि मूत्राशय की उत्तेजना को दूर करने के लिए एक अद्वितीय चिकित्सा है। इसके प्रयोग से पोटासी ब्रोमाइड की तरह दिल और दिमाग कमजोर नहीं होते बल्कि इन्हे बल मिलता है। नजर की कमजोरी, धुंधलाहट, सिर-दर्द, चक्कर, नींद न आना आदि रोगो में, जो यौन-अव्यवस्थाओ या प्रमेह व स्वप्नदोष के परिणामस्वरूप प्रकट होते हैं, इनमें यह औपधि अत्यन्त हितकर है। 

स्वप्न-दोष के लिए यह औषधि इतनी हितकर है कि प्राय सख्त से सख्त स्वप्न-दोष, यहाँ तक की प्रतिदिन दो-चार बार होने वाला स्वप्नदोष भी इसकी पहले ही दिन की दो खुराको से रुक जाता है । प्रमेह के लिए भी यह इतनी गुणकारी है कि इसके पश्चात् दी जाने वाली औषधि के लिए इस कष्ट मे अधिक तथा तुरन्त सफल होने की संभावना रहती है। यह औषधि हाजमा तेज करने का भी गुण रखती है।
सेवन विधि- प्रातः विना कुछ खाए-पीये रात के बासी पानी से आठ ग्राम फांक लें और तत्पश्चात् एक घटे तक और कुछ न खाए । इसी प्रकार आठ ग्राम सांय चार बजे के लगभग प्रात के रखे हुए पानी के साथ फाक लें, रात का भोजन इसके दो घटे पश्चात् करें।


नोट-शौच यदि अधिक पतले दस्त के रूप में होता हो तो दूसरी मात्रा सायं चार बजे लेने के वजाय रात्रि समय सोने से आधा घंटा पहले लें, परन्तु यदि कब्ज की शिकायत अधिक रहती हो तो दूसरी मात्रा साय चार बजे ही लें और रात्रि को सोते समय इसबगोल की भूसी (इस्बगोल का छिलका) चार-पांच ग्राम लेकर दस-पन्द्रह ग्राम तक ताजा पानी से फाकिए, बिना किसी कष्ट के साफ शौच होगा।


ईस्पगोल का उपयोग पहली रात्रि को थोडी मात्रा में करें यदि इससे लाभ न हो तो दूसरी रात्रि को इसकी मात्रा बढा लें, यहां तक कि प्रातः साफ शौच होने लगे (चार-पांच ग्राम से लेकर पन्द्रह ग्राम तक का यही अर्थ है) इसबगोल मे एक गुण यह भी है कि यह हानि रहित और कब्ज-नाशक होने के अतिरिक्त पतले वीर्य को गाढा करने, स्वप्नदोष और मूत्राशय की उत्तेजना को दूर करने के लिये उपरोक्त औषधि की विशेष सहायता करता है।


दूसरा योग- सफेद मूसली और मिश्री पचास-पचास ग्राम मिला कर चूर्ण बना लें।
सेवन विधि- चार से छ ग्राम जरूरत के मुताविक उपयोग करें, इससे वीर्य की उत्तेजना दूर हो जाती है, मूत्राशय की उत्तेजना ठीक हो जाती है और स्वप्नदोप को निश्चय ही लाभ होता है । यह औषधि बलदायक है और अधिक वीर्य उत्पन्न करती है।

 सिरदर्द- 

धनिया (खुश्क दाना) आठ ग्राम, खुश्क अंावले (गुठली रहित) चार ग्राम-दोनो को रात्रि समय मिट्टी के कूजे मे चैथाई किलो पानी डाल कर भिगो दें, प्रात मलकर और मिश्री मिलाकर पिलाएँ, गर्मी के कारण सिर-दर्द मे लाभदायक है।


कमजोर दिमाग -

सवा-सौ ग्राम धनिया कूटकर आधा किलो पानी मे उवालें, जब पानी जलकर केवल सवा-सौ ग्राम रह जाए तो छान कर सवा-सौ ग्राम मिश्री मिलाकर फिर पकाएँ। जब पक कर गाढा हो जाए तो उतार ले । यह मीठी औपधि प्रतिदिन आठ ग्राम चाटनी चाहिए। गर्मी और दिमाग की कमजोरी के कारण अकस्मात् पाखो के सामने अधेरा-सा छा जाता हो तो इसका यह अत्यन्त ही सरल इलाज है।


गज-

 सिर का गज एक ऐसा रोग है जिससे व्यक्ति केशघन से वंचित हो जाता है। ताजा धनिये का रस निकाल कर प्रतिदिन सिर पर लगाने से कुछ दिनो में गज दूर हो जाता है ।


आंख दर्द-

 यदि अंाखें गर्मी के कारण दुखती हो (जिसकी पहचान यह है कि एक तो वे ग्रीष्म ऋतु मे दुखेंगी, दूसरे आंखो से पानी नहीं निकलेगा वल्कि खुश्क अवस्था मे ही दुखती हैं, तीसरे आँखो को गर्मी-सी अनुभव होगी या रोगी को जलती-सी अनुभव होगी) तो ताजा धनिया पन्द्रह ग्राम और कपूर एक ग्राम वारीक पीस कर मलमल के स्वच्छ कपडे मे पोटली बंाध कर आँखो पर इस प्रकार फिरा दें कि पानी की बूदें आँख के अन्दर भी चली जाएं, तुरन्त चैन पड जाएगा।


नकसीर- 

नकसीर का खून बन्द करने के लिए ताजा धनिया का रस रोगी को सुंघाए । इसके अतिरिक्त हरे पत्ते पीस कर माथे पर लेप करें। गर्मी के कारण नाक से बहने वाला खून रुक जाता है।


खुश्क खांसी- 

धनिया (खुश्क दाना) कूट कर उसके चावल अलग कर लीजिए, इन चावलों को पीस कर आटा-सा बनाए । गर्मी के कारण हुई खुश्क खांसी मे दो ग्राम यह चूर्ण आठ ग्राम मधु मे मिला कर चटाएं, खांसी विल्कुल दूर हो जाएगी।


भूख न लगना-

यदि भूख बहुत कम लगती हो तो ताजा धनिया का रस निकाल कर तीस ग्राम प्रतिदिन पिलाएं । तीन दिन मे भूख चमक उठेगी।


उल्टी- 

यदि किसी प्रकार भी बंद होने में न आ रही हो तो ताजा धनिया का रस थोडे-थोडे समय पश्चात् एक-एक घूंट पिलाना चाहिए, उल्टी तुरन्त बन्द हो जाती है।


दस्त- 

दस्त आ रहे हो तो धनिया (दाना) बारीक पीस लें और छाछ या पानी के साथ आठ-आठ ग्राम दिन में तीन बार सेवन करें, चाहे कितने ही दस्त आ रहे हो बन्द हो जाते हैं।
यदि दस्तों में खून आता हो तो पन्द्रह ग्राम धनिया पानी मे ठण्डाई के रूप में घोट-छानकर और मिश्री मिला कर पिलाए, एक दिन मे भरसक लाभ होगा।


बदहजमी- 

जिस व्यक्ति के मेदे मंे आहार बहुत कम ठहरता हो अर्थात् जल्दी ही शौच के रूप में निकल जाता हो, उसके लिए निम्नलिखित नुस्खा तैयार कीजिए
धनिया साठ ग्राम, काली मिर्च पच्चीस ग्राम, नमक पच्चीस ग्राम-्, बारीक पीस कर चूर्ण बनाए। मात्रा केवल तीन ग्राम भोजन के पश्चात् लें। तुरंत आराम मिलेगा। 


हृदय रोग-

हृदय धडकता हो तो धनिया साठ ग्राम कूट-छान कर मिश्री साठ ग्राम मिला लें और प्रतिदिन सात ग्राम यह चूरण ठण्डे जल से सेवन करें।
या.
पन्द्रह ग्राम धनिया कूट कर रात के समय मिट्टी के कोरे कूजे मे आधा किलो पानी डालकर भिगो दें। प्रात छान कर बराबर मात्रा मिश्री मिला कर पी लें।


मूत्र की जलन-्-

 यदि मूत्र जल कर आता हो तो धनिया आठ ग्राम पानी में घोल कर छान लें। इसमें मिश्री तथा बकरी का दूध मिला कर पेट भर कर पिला दें। दिन में दो वार देना चाहिए। दो-तीन दिन मे मूत्र की जलन दूर हो जाएगी।


मासिक-धर्म की अधिकता-

 कई महिलाओ को मासिक धर्म बहुत अधिक मात्रा में आने लगता है जिसके कारण कमजोरी अत्यधिक बढ जाती है। ऐसी हालत मे आठ ग्राम धनिया आधा किलो पानी मे उबालें। जब आधा पानी जल जाए तो उतार कर मिश्री मिला कर गुनगुना ही पिलाए । तीन-चार मात्रा से आराम आ जाता है।

गर्भिणी  की उल्टी -

गर्भकाल मे स्त्री को प्राय प्रात समय उल्टी हुआ करती है जिसके कारण स्त्री कष्ट पाती है। इसका सरल इलाज यह है कि चावलो के पानी में आठ ग्राम खुश्क धनिया कट-छान कर और मिश्री मिलाकर पिलाए।


नीद न आना-

नींद न आने पर तीस ग्राम भुना धनिया, तीस ग्राम भुनी खशखश, तीस ग्राम काहू, तीस ग्राम वादाम की गिरी, पन्द्रह ग्राम कद्द, की गिरी, पन्द्रह ग्राम सदलबुरादा (सफेद) और तवाशीर बारह ग्राम-सबका चूर्ण बनाए। आठ ग्राम प्रति मात्रा दिन में तीन बार दूध या खसखस शर्बत या पानी के साथ उपयोग करें।


.खूनी बवासीर- 

यदि बवासीर का खून काले रंग का हो तो इसे बन्द करने का प्रयत्न न करें परन्तु जब सुर्ख खून निकलता हो और इसके कारण रोगी दिनोदिन कमजोर हो तो उस समय खून बंद करने का इलाज करना चाहिए, एक नुस्खा यह है आठ ग्राम धनिया चूर्ण पानी में घोट-छान कर तथा पचास ग्राम मिश्री और सवा-सौ ग्राम बकरी का दूध मिला कर तथा बार-बार फेंट कर (ऊपर-नीचे करके) पिला दें इसमे बवासीर का खून बन्द हो जाता है । मूत्र जलन के साथ आता हो तो उसके लिए भी यही नुस्खा काम मे लाइये।


प्यास की  तेजी-

खुश्क धनिया तीस ग्राम कूट कर मिट्टी के कोरे कूचे में डालकर आधा किलो पानी में रात-भर भिगो रखें। प्रात मलमल के कपडे मे छान कर और मिश्री मिला कर पिलाए-् प्यास बन्द होगी, गर्मी के कारण हो या किसी दूमरे कारण से ।


सूजन-

 शरीर के किसी भाग में सूजन हो गई हो और उसमें से सेंक- सा अनुभव होता तो इस पर सिरके में धनिया पीस कर लेप करने से सूजन उतर जायेगी।
 

Read More

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

Haldi ke fayde / हल्दी के फायदे

Haldi ke fayde

 


हल्दी के फायदेः- 


मूत्र की अधिकता - यदि किसी व्यक्ति को बार-बार और अधिक मात्रा में मूत्र आए तथा प्यास अधिक लगे तो इस रोग को वैद्य लोग मधुमेह कहते हैं । इस रोग को दूर करने के लिए हल्दी एक विशेष चीज है। हल्दी बारीक पीसकर रखें । आठ-आठ ग्राम दिन में दो बार पानी के साथ दें। इस साधारण-सी औषधि से पेचीदा और घातक रोगो का इलाज सफलतापूर्वक किया जा सकता है ।

नोट- मधुमेह के रोगी को चीनी से परहेज करना चाहिए, ऐसे रोगी के लिए यह विष के समान है।


कमजोर नजर- नजर की कमजोरी दूर करने के लिए निम्नलिखित नुस्खा अत्यंत गुणकारी है। स्वस्थ व्यक्ति इसे सर्वदा उपयोग करता रहे तो जीवनभर नजर ठीक रहेगी।
हल्दी ढेला (गांठ) तीस ग्राम और कलमी शोरा आठ ग्राम। दोनों को मैदे की तरह वारीक पीस लें और शीशी में मजबूत कार्क लगाकर रखें। प्रात. व साय तीन-तीन सलाई डालना धुन्ध और नजर की कमजोरी के लिए जादू जैसा प्रभाव रखता है । आजमा कर देखिये।
हल्दी को खूब वारीक पीसकर शीशी में सावधानीपूर्वक रखें । रात्रि नमय तीन-तीन सलाइयां डालने से नजर की कमजोरी दूर होगी।


आंख का घाव- यदि किसी कारणवश आंख में घाव हो गया हो तो उनके लिए हल्दी के ढेले को पानी की कुछ बूंदे डालकर पत्थर पर घिसें और सलाई ने आँख में लगाएँ । कुछ समय लगाने से घाव ठीक हो जायेगा।


बेमिसाल टिंकचर- सवा सौ ग्राम हल्दी को पांच सौ ग्राम मेथिलेटिड स्पिरिट में मिलाकर शीशी में डालें और कार्क लगाकर धूप में रख दें। दिन मे दो-तीन बार जोर से हिला दिया करें। तीन दिन पश्चात् छानकर फिर शीशी मे रख लें-यही हल्दी का वेभिसाल टिंकचर है ।


सेवन विधि- दिन में दो-तीन बार सफेद दागो पर लगाएं, सफेद दागों के लिए अत्यन्त हितकर है।
अद्भुत तेल-- पचास ग्राम हल्दी को मोटा-मोटा कूटकर सौ ग्राम पानी में उबालें। फिर पीस-छानकर केवल पानी ले लीजिए। इस पानी के वराबर मीठा तेल मिलाकर धीमी अंाच पर चढाइये। जब पानी जलकर केवल तेल बच रहे तो उतारकर ठण्डा करके शीशी मे भर लें।


सेवन विधि- इम तेल को जरा-सा गर्म करके दो-तीन वूंद कान मंे प्रात व साय डालें। दस-बारह दिन के उपयोग से घाव ठीक होकर पीप का आना वन्द हो जाएगा। यही तेल अन्य घावों पर लगाते रहने से भी घाव अच्छे हो जाते हैं।


ममीरा हल्दी- यदि हल्दी को निम्नलिखित ढंग से तैयार कर लिया जाए तो इसमें वे सभी गुण पैदा हो जाते हैं जो ममीरे में होते हैं । एक गांठ हल्दी लेकर कलईदार वर्तन में डालें। फिर इस पर एक नीबू निचोडें । अब इसे कोयलो की आंच पर रखकर पकाए । जब पानी सूख जाए तो दूसरा नीबू निचोडें और इसे भी सुखा दें। इस प्रकार सात नीबू का रस सुखा दें। बस अब यह हल्दी की गाठ ममीरे के गुणो से युक्त हो गई है।
इसे वारीक पीसकर बराबर वजन काला सुरमा मिलाकर खूब लें, सुरमा तैयार है।
रात्रि समय दो-तीन सलाई डाले । कुछ ही दिनों में धुंध, जाला, तथा रात्रि समय दिखाई न देना आदि रोगों में आराम मिलेगा। 


सुजाक तोड़- हल्दी की गांठ पांच ग्राम लेकर ढाई- सौ ग्राम बकरी के कच्चे दूध में घिसे और तुरन्त सूजाक के रोगी को पिला दें। इस प्रकार प्रतिदिन प्रातः पिलाने से कुछ दिनों में सूजाक की जड़ें कट जाएगी। यह एक हकीम का अत्यन्त गुप्त नुस्खा है।


निगेन्द्रिय में घाव (सूजाक) हो तो आठ-आठ ग्राम बारीक पिसी हुई हल्दी बकरी के दूध की छाछ या पानी के साथ प्रात व साय सेवन करवाएं। रोग की तेजी में दोपहर के समय भी दें ।


हल्दी और आवलों का काढा भी अत्यन्त हितकर है। इस काढे से मूत्र की जलन दूर होकर मूत्र साफ आने लगता है और पेट भी साफ हो जाता है ।


मुंह के छाले- हल्दी पन्द्रह ग्राम कूटकर एक किलो पानी में उवालें, ठण्डा होने पर प्रात व सांय गरारे करें। इससे गले, तालु और जिह्वा के छाले दूर हो जाते हैं।


.कठमाला- बाारीक पिसी हल्दी आठ ग्राम प्रातः पानी के साथ सेवन करवाएं। इसके अतिरिक्त हल्दी की गांठ को पत्थर पर कुछ बूदें पानी डालकर घिसें। जब गाढा-सा लेप तैयार हो जाए तो ऊपर लेप कर दें। कुछ दिनो के निरन्तर उपयोग मे रोग दूर हो जाएगा।


. पेट मे हवा भर जाना- जिस व्यक्ति के पेट में हवा भर गई हो और इस कारण पेट मे अफारा हो रहा हो, उसकी तकलीफ का अनुमान कोई भुगतभोगी ही कर सकता है । ऐसे अवसर पर पिसी हुई हल्दी दस रत्ती और नमक दस रत्ती मिलाकर गर्म पानी से सेवन करवाएँ। इससे हवा निकलकर होकर पेट हल्का हो जाता है। कई दिन तक उपयोग करने से हाजमे की कमजोरी भी दूर हो जाती है


आंख की लाली- चोट लगने से या किसी और कारणवश आँख लाल हो जाए तो हल्दी स्वच्छ पत्थर पर घिसकर सलाई से लगाए । दो-तीन दिन में लाली साफ हो जाती है ।


चवल- दो-तीन वार दिन में और रात्रि को सोते समय हल्दी के गाढे लेप से वर्षों पुराना चवल दूर हो जाता है ।
फुलवहरी- कोड, फुलवहरी, कठमाला की शिकायत हो तो आठ आठ ग्राम हल्दी का चूर्ण प्रात. व साय पानी के साथ खाए और दिन मे दो तीन वार लेप भी करें।


.विषेला डंक-पागल कुत्ते के काटने पर पचास-साठ ग्राम हल्दी पानी के साथ सेवन कराने से तथा काटे स्थान पर हल्दी का लेप करने से लाभ होता है । विच्छु, भिड तथा मक्खी इत्यादि के डंक पर भी हल्दी का लेप करना अत्यन्त हितकर है ।


बवासीर- पांच-पांच ग्राम हल्दी का चूर्ण दोनो समय बकरी के दूध की छाछ के साथ सेवन करना बवासीर का उत्तम इलाज है ।


बलगमी दमा- चार-चार ग्राम हल्दी का चूर्ण दिन में तीन बार सेवन करने से वलगमी दमा दूर हो जाता है।


जुकाम-नजला- जुकाम, कफ आदि रोगो मे हल्दी अत्यन्त हितकर सिद्ध हुई है । प्रयोग से यह प्रमाणित हुआ है कि कफ से रुके हुए गले में और वहते हुए जुकाम मे हल्दी के उपयोग से खुश्की पैदा हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कफ का बढना रुक जाता है।
पांच-पांच ग्राम हल्दी का चूर्ण प्रात. व साय गर्म पानी से सेवन किया जाए।


गले के घाव- गले और तालु में घाव हो तो एक किलो पानी में सत्तर ग्राम वारीक पिसी हुई हल्दी मिलाकर उवालें। जब चैथाई पानी वाकी रह जाए तव छानकर इससे गरारे करें। यह इलाज प्रात व साय दोनो समय करें।
 

Read More
Blogger द्वारा संचालित.