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शनिवार, 2 जनवरी 2021

Ayurved ka samanya parichaya / आयुर्वेद का सामान्य परिचय

Ayurved ka samanya parichaya 


आयुर्वेद का सामान्य परिचय


भारतवर्ष में प्राचीन काल से चली आ रही आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र की उत्पत्ति आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हुई थी। यह प्रणाली विश्व के अतिप्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में से एक है। इसे ऋग्वेद के उपवेद की संज्ञा प्रदान की गई है। 


यह दो शब्दों से मिलकर बना है- आयुष और वेद। 


हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते।। चरक संहिता 1-40।

तात्पर्य है कि जिस गं्रथ में हित आयु अथवा जीवन के अनुकूल, अहित आयु अर्थात जीवन के प्र्रतिकूल, सुख आयु अर्थात स्वस्थ जीवन एवं दुख आयु अर्थात रोग अवस्था का वर्णन हो, वह आयुर्वेद कहलाता है। 


आयुर्वेद की परिभाषाः-
आयुर्वेद के प्रयोग से जीवन के प्रत्येक छोटे बडे रोग का जड से निवारण किया जा सकता है। 


आयुर्वेेदयति बोधयति इति आयुर्वेदः ।
भावार्थः- जो शास्त्र या विज्ञान जीवन व आयु का ज्ञान कराता है। वह आयुर्वेद कहलाता है। स्वस्थ व्यक्ति व रोगी के लिये उत्तम मार्ग बताने वाला विज्ञान आयुर्वेद कहलाता है। जिस शास्त्र में आयु का विभाग, आयु विद्या, सूत्र, ज्ञान, लक्षण, तंत्र तथा शारीरिक रचनाएं आदि की जानकारी मिलती है, वह आयुर्वेद कहलाता है। 


यह जीवन का विज्ञान है। हमारे देश में प्राचीन काल में इसे गुरूकुल में भी पढाया जाता था और वंशानुगत ज्ञान भी दिया जाता था। समय के साथ इसका प्रचार कम होता गया। परंतु उपयोगिता कम नहीं हुई। आज के समय में भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी इसका भरपूर प्रचार है। वहां के लोग भी आयुर्वेद से उपचार कराने में अपनी रूचि दिखा रहे है। यह अपनी पद्धति से शारीरिक समस्याओं का निदान करने के साथ साथ व्यक्ति को शारीरिक तथा मानसिक रूप से भी मजबूत करता है। 


यह वेद की एक शाखा है। वेद में अनेक पहलू है। आयुर्वेद के ग्रंथों में हजारों सालों के शोध समाहित है। जो कि सभी मानवों पर मान्य है। इस शास्त्र के प्राचीन आचार्य अश्विनी माने जाते है। अश्विनी कुमारों ने इंद्र को यह ज्ञान प्रदान किया। इंद्र ने धन्वंतरी को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। काशी के राजा दिवोदास को धन्वंतरी का अवतार कहा जाता है। इन्होंने सुश्रुत को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। अत्रि और भारद्वाज को भी इस शास्त्र का प्रवर्तक माना जाता है। इसके अलावा नकुल, सहदेव, अर्कि, च्यवन, जनक, बुध, जावाल, जाललि, पैल, करथ, अगस्त्य, अत्रि, अग्निवेश, जातुकर्ण, पराशर, सीरपाणि तथा हारीत भी आयुर्वेद के प्रवर्तक माने जाते है। 


प्राकृतिक पदार्थों का आयुर्वेद के साथ अटूट संबंध है। वे तत्व आयुर्वेद के माध्यम से हमारे जीवन के सभी शारीरिक पहलुओं को संतुलित व व्यवस्थित करने में सहायक है। यह खान पान, जडी बूटी तथा व्यायाम के द्वारा प्राणी के शरीर को स्वस्थ रखने के सिद्धान्त प्रतिपादित करता है। 


युगों के बीत जाने के बाद आयुर्वेदिक चिकित्सकों, जिनको वैद्य कहते है के रूप में जाना जाता है। उनके अनुसार सम्यक भोजन ही सबसे बडी औषधी है, जिससे व्यक्ति की संपूर्ण व्यवस्था जुडी हुई है। आहार प्रणाली के अनुसार सही पोषण शरीर को शुद्ध रखता है। यह कार्यों और आवश्कताओं को प्राकृतिक रूप से पूर्ण करने में सहायक है।
 

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