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गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

Mardana takat dete hai ye ayurvedik tatva \ मर्दाना ताकत देती है ये आयुर्वेदिक तत्व

Mardana takat dete hai ye ayurvedik tatva

 

मर्दाना ताकत देती है ये आयुर्वेदिक तत्व


आयुर्वेद में दूध को सबसे अच्छा और सुलभ वाजीकरण कारक औषधी माना है। दूध से वीर्य की वृद्धि, कामशक्ति में बढोतरी, तथा भरपूर मर्दाना ताकत मिलती है। सहवास से पहले गर्म दूध पीने से मर्दाना जोश भर जाता है। प्रचुर मात्रा में वीर्य निकलता है। वहीं दूसरी तरफ यदि संभोग के बाद गर्म व मीठा दूध पीते है तो संभोग के बाद क्षीण हुई ताकत वापस आ जाती है। थकान दूर होती है। इसलिये युवाओं को संभोग के बाद दूध जरूर पीना चाहिये।
उड़द की दाल, उड़द के लड्डू, दूध में बनाई हुई उड़द की खीर अत्यन्त वृष्य, वर्दक एवं कामशक्ति वर्द्धक होती है। जो व्यक्ति समर्थ हैं, उन्हें उड़द की खीर बनाकर या फिर उड़द के लड्ड बनाकर सेवन करना चाहिए।


अण्डा एक तरह से आमगर्भ का ही रूप है। इसमें वीर्य को बढ़ाने की ताकत होती है। प्रत्येक पुरुष को इसका सेवन करना चाहिये। उन्हें दूध में अण्डे की जर्दी मिलाकर पीना चाहिए। इससे वीर्य की वद्धि तो होती ही है साथ ही कामशक्ति भी बढ़ती है। शरीर में शक्ति का संचार होता है। मुर्गी एवं मोरनी के अण्डे तो अमुमन खाये ही जाते हैं किन्तु चिड़िया के अंडे भी अत्यन्त वाजीकर माने जाते हैं। वाजीकरण योगों में इनका विभिन्न पकवानों के रूप में वर्णन प्राप्त होता है।


अश्वगन्धा- यह भारत वर्ष में सब जगह उपलब्ध होती है। राजस्थान के नागौर जिले (क्षेत्र) में उपजने वाली असगन्ध, नागौरी असगन्ध के नाम से विख्यात है। दवा के लिए इसकी जड़ का ही उपयोग किया जाता है। इसमें अश्व के समान कामशक्ति उत्पन्न करने की क्षमता होने से तथा पौधे से घोड़े के समान गन्ध आने से ही इसका नाम अश्वगन्धा पड़ा है।


यौन दुर्बलता तथा शारीरिक शक्ति बढ़ाने के लिए इसकी जड़ का चूर्ण 3-3 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से चमत्कारिक लाभ होता है। इसके कुछ दिनों के नियमित प्रयोग से शरीर हृष्ट-पुष्ट हो जाता है तथा कामशक्ति बढ़ती है। धातुक्षीणता, वीर्यक्षय, कामोत्तेजना ह्रास, स्नायु दुर्बलता, मानसिक एवं शारीरिक दुर्बलता इत्यादि रोगों में अश्वगन्धा का सेवन लाभप्रद होता है। जब वीर्य का क्षय हो जाता है तो स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है, किसी काम में मन नहीं लगता, आलस्य एवं थकावट बनी रहती है, स्त्री सहवास की इच्छा नहीं रहती और स्त्री के पास आने से कतराने लगता है, कामोत्तेजना ठीक से नहीं होती, ऐसी स्थिति में अश्वगन्धा के चूर्ण को गाय के घी में मिलाकर चाटने व ऊपर से गाय का गर्म दूध पीने से पूर्ण आराम मिलता है।


शतावरी- इसका पौधा (बेल) सम्पूर्ण भारत वर्ष विशेषकर उत्तर भारत में पाया जाता है। इसकी भी जड़ का औषध रूप में उपयोग होता है। बल-वीर्य की कमी में इसकी जड़ का चूर्ण 5-5 ग्राम सुबह-शाम माठ गर्म दूध के साथ लेना चाहिए। इसे दूध में चाय की तरह पकाकर भी लिया जा सकता है। इसके सेवन से वीर्य की खूब वद्धि होती है। स्त्रियों में यह स्तन (वक्ष) को बढ़ाती है। शतावरी का ताजा रस 10 ग्राम मात्रा में सेवन करने से भी कुछ दिनों में वीर्य की वृद्धि होती है।


विदारीकन्द- इसकी भी बेल सम्पूर्ण भरतवर्ष में विशेषकर हिमालय की निचली पहाड़ियों, बंगाल, असम, पंजाब आदि स्थानों पर मिलती है। यह भी परम वाजीकर.पौष्टिक बल-वीर्यवर्द्धक है। इसके चूर्ण की 5-5 ग्राम मात्रा सुबह-शाम विषम मात्रा में घी व शहद मिलाकर चाटने तथा ऊपर से गर्म दूध पीने से पुरुष की कामशक्ति बढ़ाती है।
विदारीकन्द के चूर्ण में इसी का ताजा रस मिला कर 21 बार (21 दिन तक घोटें व सुखाकर डिब्बे में सुरक्षित रखें। इसमें से 5-5 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन उपर्यक्त तरीके दूध के साथ सेवन करने से पुरुष सफल संभोग करने की ताकत प्राप्त करता है।


कौंच-इसे कैंवाच, कपिकच्छु आदि नामों से भी जाना जाता है । कामशक्ति बढ़ाने के लिए इसके बीजों का उपयोग होता है। इससे वीर्य की मात्रा खूब बढती है. कामोत्तेजना जागृत होती है तथा शीघ्रपतन की शिकायत दूर होती है। कौंच के बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनके ऊपर का छिलका हटा लें तथा सुखाकर उनका बारीक पाउडर बना लें। इस पाउडर को 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम मिश्री मिलाकर दूध के साथ लेने से लिंग की शिथिलता एवं शीघ्रपतन दूर होकर शक्ति बढ़ती है।
अश्वगन्धा, सफेद मूसली, कौंच के बीज तथा मिश्री बराबर मात्रा में लेकर महीन चूर्ण तैयार कर लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण सुबह-शाम दूध के साथ लेने से लिंग की शिथिलता - व शीघ्रपतन और धातुक्षीणता में बहुत लाभ होता है।
सेमल- इसका गोंद मोचरस कहलाता है। इसके पेड़ प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष में पाये जाते हैं। यौन रोगों में सेमल की जड़ तथा गोंद का प्रयोग होता है। सेमल की जड़ का चूर्ण तथा मूसली का चूर्ण 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम मीठे दूध के साथ लेने से वीर्य की वृद्धि होकर कामशक्ति बढ़ती है। शीघ्रपतन तथा स्वप्नदोष के रोगियों को इसका गोंद बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 6-6 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम दूध अथवा पानी के साथ लेने से लाभ होता है। गाँवों में लोग इसकी जड़ की छाल के रस का प्रयोग भी उपर्युक्त रोगों में करते हैं।


मूसली -यह प्रायः सम्पूर्ण भारत वर्ष में पैदा होती है। यह दो प्रकार की होती है - (1) सफेद मूसली तथा (2) काली मूसली। सफेद मूसली काली मूसली की अपेक्षा विशेष गुणकारी होती है। मूसली वीर्य को गाढ़ा करती है। इसका चूर्ण 3-3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ लेने से वीर्य वृद्धि होकर कामोत्तेजना बढ़ाती है। इसका चूर्ण 10 ग्राम की मात्रा में 250 ग्राम दूध के साथ लें। दूध (गाय का हो तो ज्यादा अच्छा है) में अच्छी तरह से उबालकर मिट्टी के बर्तन में रख दें। सुबह-सुबह पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन करें। शीघ्रपतन, लिंग की शिथिलता, धातुक्षीणता एवं काम के प्रति अनिच्छा में अद्भुत लाभ मिलता है।


गोखरू-गोखरू वर्षा ऋतु में प्रायः सभी जगह उगा हुआ दिखाई देता है। इसका फल जो कि कांटेदार (गाय के खुर के समान) होता है, औषधि के काम आता है। इसके बीजों का चूर्ण बनाकर रखें। इसमें काले तिल मिलाकर दोनों 10-10 ग्राम की मात्रा में (कुल 20 ग्राम) लेकर 250 ग्राम दूध में पकायें। खीर की तरह तैयार हो जाने पर 25 ग्राम मिश्री का चूर्ण मिलाकर खाने से नपुंसकता दूर होती है।
आंवले का चूर्ण, गोखरू का चूर्ण और नीम गिलोय का चूर्ण बराबर-बराबर बना लें। इसे रसायन चूर्ण कहते हैं। इसकी 1-1 चम्मच मात्रा दिन में 3 बार ताजा पानी या दूध के साथ लेने से नपुंसकता, कामेच्छा में कमी, वीर्य की कमी, प्रमेह, प्रदर, तथा मूत्रकृच्छता के रोग दूर होते है। पुरूष अधिक समय तक स्त्री के साथ रमण कर सकता है।

 
तालमखाना- यह धान के खेतों में पाया जाता है। इसके बीज तालमखाना के नाम से मिलते है। वीर्य का पतलापन, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष, धातुक्षीणता, आदि विकारों में तालमखाना का चूर्ण सुबह 3 - 3 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम दूध के साथ लेने से वीर्य गाढा होता है तथा मर्दाना जोश जागता है।
इस प्रकार यह आयुर्वेदिक तत्व पुरूषों में वाजीकरण करके मर्दाना ताकत प्रदान करते है।
 

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