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बुधवार, 30 दिसंबर 2020

Sharirik durbalta nashak kuch saral upay \ शारीरिक दुर्बलता नाशक कुछ सरल उपाय

 Sharirik durbalta nashak kuch saral upay

 


शारीरिक दुर्बलता नाशक कुछ सरल उपाय 

अंतरंग जीवन से सम्बन्धित अनेक समस्याएँ हैं, परंतु जीवन में यौन दुर्बलता की समस्या एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान आवश्यक ही नहीं अति आवश्यक है। अन्यथा जीवन नीरस, निस्सार, आत्मग्लानि से परिपूर्ण एवं उत्साहरहित प्रतीत होने लगता है। इसके बढने से जीवन में समस्याओं का अंबार सा लग जाता है। यदि यौन जीवन सुख और आन्नद से चलता रहता है तो व्यक्ति अन्य समस्याओं को बडी सरलता से निवारण कर देता है। क्योंकि उसे अपने यौन जीवन में निरंतर आन्नद और सुख की प्राप्ति हो रही है। उसे यहां से प्रोत्साहन मिलता रहता है। आइये देखते है यौन दुर्बलता दूर करने के कुछ सरल और घरेलू उपाय:-

  • त्रिफला चूर्ण प्रयोग यह चूर्ण रसायन है। प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था में प्रतिदिन रात्रि को सोते समय 10 ग्राम चूर्ण पानी के साथ सेवन करने से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है एवं यौन दुबलता के शिकार नहीं होते। 

  • प्रतिदिन तुलसी के 1 ग्राम बीजों का चूर्ण सायं भोजन के 1 घण्टे पश्चात् गाय के दूध में तीन मनक्के, पांच काली मिर्च, पांच गुठली रहित छुआरे औटा कर 1 चम्मच गाय के घी में मिलाकर सेवन करें। यह यौन दुर्बलता नाशक असरदार एवं शक्तिवर्धक प्रयोग है। 

  • मलहठी का 6 ग्राम चूर्ण दूध के साथ सेवन करने से यौन दुर्बलता नहीं हो पाती। यदि हो भी जाये तो नष्ट हो जाती है।
    शतावरी का चूर्ण 5 से 10 ग्राम प्रतिदिन दूध के साथ सेवन करने से शक्ति बढ़ती है। यदि इसी दूध में दो चम्मच गोघृत, तीन चम्मच शहद तथा दो चम्मच मिश्री मिलाकर सेवन करें तो आश्चर्यजनक वीर्य वृद्धि होती है। इसका सेवन करने वाला कोई ही मन्दभागी होगा जो संसार में दुर्बल कहलाएगा। 

  • सफेद मूसली का चूर्ण 10 ग्राम, गाय के 250 ग्राम दूध में 3-4 चम्मच पिसी हुई मिश्री मिला कर पकाएं । जब गाढ़ी खीर जैसी बन जाए तब प्लेट में डालकर रख दें। प्रातःकाल तक खीर जम जाएगी, तब इसका सेवन करें। ऐसा 40 दिन तक करें। गर्म और खट्टे पदार्थों का सेवन बन्द करें और फिर इसका चमत्कार देखें। 

  • भिन्डी की जड़ छाया में सुखाई गई 250 ग्राम को जौकुट करके शीशी में भर लें। इसमें से 10 ग्राम दवा रात्रि में 250 ग्राम पानी में भिगो दें। प्रातरूकाल पानी. छानकर मिश्री मिलाकर पिला दें। निरन्तर 25 दिन तक सेवन करने से प्रमेह एवं स्वप्नदोष दूर होकर बलवीर्य की वृद्धि होती है। 

  • नागोरी असगन्ध और मिश्री का समभाग चूर्ण प्रतिदिन 5 से 10 ग्राम फांककर ऊपर से गाय का दूध् पीयें। इसके सेवन से दुर्बल व्यक्ति मोटे तथा ठिगने व्यक्ति लम्बे होते हैं। हाथ-पैर, जंघाओं व जोड़ों का दर्द, धातु एवं गर्भाशय की दुर्बलता तथा सिर दर्द आदि रोग नष्ट होते हैं। 

  • ऊंट कटेरा की जड़ की छाल 5 ग्राम, अकरकरा 3.ग्राम, असगन्ध नागोरी 2 ग्राम, ये एक मात्रा है। तीनों को पीस कर बादाम, गाजर या सिंगाड़े के हलवे में मिला कर कुछ सप्ताह सेवन करें। इसके सेवन से बलवीर्य बढ़ता है। जिन पुरुषों के वीर्य में शुक्राणु नहीं होते उनमें शुक्राणु उत्पन्न हो जाते हैं और सन्तान उत्पत्ति की शक्ति एवं क्षमता आ जाती है।
  • इन औषधियों का सेवन करते दिनों में आपको कुछ परहेज रखने चाहिये। तभी ये औषधियां पूर्ण रूप से अपना प्रभाव दिखायेगी। जैसे तेल मसाले, मांस मदिरा, गुटखा जर्दा तंबाकु खैनी पानमसाला, सभी तरह की खटटी चीजों का त्याग करना चाहिये। तभी आपको इन उपायों का पूर्ण प्रभाव देखने को मिलेगा।
     
  • कल्प चिकित्सा:-
    कल्प चिकित्सा भी आयुर्वेद का ही एक अंग है। इस चिकित्सा द्वारा वृद्ध व्यक्ति भी रात भर घोडे की तरह दौड सकता है। अपनी शारीरिक दुर्बलता से पीछा छुडा सकता है। कल्प चिकित्सा में आम्रकल्प, दुग्धकल्प, आमलकी कल्प, रसौन कल्प, तक्र कल्प, प्रमुख है। जिनको किसी योग्य वैद्य की देखरेख में प्रयोग कर सकते है। वरना पूर्ण लाभ नहीं मिलता। कुछ प्रयोग इस प्रकार है-

  •  सफेद पुष्प वाली पुनर्नवा की 20 ग्राम जड़ को दूध में पीस कर 1 वर्ष तक सेवन करने से वृद्ध पुरुष भी जवान हो जाता है। यौन दुर्बलता नष्ट हो जाती है। सूखे हुए शृंगराज एवं आँवला, काले तिल एवं मिश्री चारों समभाग लेकर चूर्ण कर लें। प्रतिदिन प्रातः -सायं 6-6 ग्राम खाकर ऊपर से दूध पी लें। 1 वर्ष तक नियमित सेवन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें व लाभ उठाएं। 

  • . प्रतिदिन भोजन के पश्चात् दो-तीन छोटी काली हरड़ चूसने से पेट के समस्त विकार दूर होते हैं। दस्त खुलकर आते हैं। गैस की समस्या दूर होती है। भूख अच्छी लगती है। पाचन शक्ति बढ़ती है। रक्त शुद्ध होता है। नेत्रों के लिए भी हितकर है। निरन्तर सेवन करने से चश्में का नम्बर भी घटता है। लगभग एक घण्टा मुंह में रखकर चूसने से हरड़ गल जाती है। इसकी प्रशंसा में ठीक ही कहा है-
    यस्य माता गृहेनास्ति, तस्य माता हरीतकी।
    कदाचित कुप्यते माता, नो उदरस्था हरीतकी।
     अर्थात् जिसके घर में माता नहीं है उसकी माता हरड़ है। माता कभी क्रुद्ध हो जाती है। परन्तु पेट में गई हुई हरड़ कभी कुपित नहीं होती। और भी
    हरी हरीतकी चैव, गायत्री च दिन दिने ।
    मोक्षारोग्य तपः कामश्चिन्त मेद भक्षयेज्जयेत ।।
    अर्थात् मोक्ष, आरोग्य और तप की इच्छा करने वाले को प्रतिदिन परमात्मा, हरड़ और गायत्री का सेवन और जप करना चाहिए।
     
  • प्रमेह और शुक्रतारल्य- 10 ग्राम कतीरा गोंद लेकर कुछ दरदरा कर लें । काँच के बर्तन में जिसमें 1 किलो पानी आ सके आधा किलो पानी भरकर रात्रि में कतीरा गोंद डाल दें। प्रातः वर्तन फूले हुए कतीरा गोंद से भरा हुआ मिलेगा। इसमें पिसी मिश्री मिलाकर चम्मच से खायें। इसका प्रयोग प्रत्येक ऋतु में किया जा सकता है। इसके सेवन से प्रमेह, शुक्रतारल्य, मूत्र में जलन, स्त्रियों में आर्तव को कमी. हाथ-पैरों की हथेलियों एवं तलवों में जलन, खुश्की, हड्डफूटन, प्यास अधिक लगना तथा सिर की जलन आदि बीमारियाँ दूर होती है। यौन दुर्बलता समाप्त होती है।
    आयुर्वेदानुसार साठा सो पाठा। साठ वर्ष तक तो व्यक्ति जवान ही कहलाता है। अस्सी वर्ष की आयु तक सन्तानोत्पति सम्भव हो सकती है। वृद्धावस्था का अहसास नहीं होता।


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