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शनिवार, 2 जनवरी 2021

Vajikaran sevan ke samay khan pan kaisa ho, janiye is lekh me \ वाजीकरण सेवन के समय खान-पान कैसा हो, जानिए इस लेख में

Vajikaran sevan ke samay khan pan kaisa ho, janiye is lekh me

 

 

वाजीकरण सेवन के समय खान-पान कैसा हो, जानिए इस लेख में



आयुर्वेद की कोई भी दवा करते समय पथ्य-अपथ्य का विशेष ध्यान रखना होता है। उसी प्रकार वाजीकरण औषध सेवन करते समय भी व्यक्ति की आहार व्यवस्था विशेष महत्त्व है। इस अन्तराल में भोजन लघु, सुपाच्य तथा पौष्टिक होना चाहिये। सबसे पर बात तो यह है कि इस अवधि में कब्ज नहीं रहे तथा दोनों वक्त खुलकर शौच जाना है। खाने में मौसमी फल, हरी सब्जियाँ, मोटे आटे की रोटी, खिचड़ी, दलिया, दूध, सलाद इमाम का सेवन हितकर होता है। खटाई, खट्टे फल कदापि सेवन न करें। धूम्रपान, तम्बाकु जर्दा गुटखा, पान, शराब इत्यादि नशीले पदार्थ भी सेवन न करें।


सारांश- वाजीकरण आयुर्वेद के आठ अंगों का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इसका मुख्य उद्देश्य क्षीण पुंसत्व शक्ति वाले पुरुष में प्रशस्त वीर्य का आधार कर सम्भोग शक्ति संपन्न बनाना एवं पुरुषों में वीर्य वृद्धिकर भावों की उत्पत्ति एवं स्तम्भन शक्ति प्रदान करना है। साथ ही सन्तानोत्पत्ति की क्षमता प्रदान करना, शुक्राणुओं का निर्माण शुक्राणुओं की गतिशीलता, शुक्राणुओं की कमी को दूर कर उनकी वृद्धि करना भी इस अंग का मुख्य उद्देश्य है।


वाजीकरण से तात्पर्य है कि जिस युक्ति या क्रिया के द्वारा पुरुष पूर्ण सामर्थ्ययुक्त होकर स्त्री गमन में, स्त्री को सन्तुष्ट करने में समर्थ होता है अथवा कामशक्ति रहित पुरुष को कामशक्ति सम्पन्न बनाना ही वाजीकरण है। स्वभावतः अल्पवीर्य वाले व्यक्तियों में वीर्य का आप्यायन, प्रकुपित दोषों (रोगाणुओं आदि) से दूषित (विकृत) वीर्य का प्रसादन, क्षय को प्राप्त अत्यन्त क्षीण वीर्य का अपचय, वृद्धावस्था में अल्प वीर्य होने पर वीर्य का निर्माण तथा स्वस्थ जितेन्द्रिय व्यक्तियों में वीर्य वृद्धि तथा स्तम्भन शक्ति प्रदान करना सभी वाजीकरण के विषय हैं।


यद्यपि वेदादि, प्राचीन धर्म ग्रन्थों तथा आचार्यों ने 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्याश्रम की परिकल्पना कर इस उम्र में शारीरिक सम्बन्धों का निषेध किया है, किंतु पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभाव, चलचित्र, दूरदर्शन, अमर्यादित आचार-विचार व रहन-सहन, अनैतिक क्रिया-कलाप तथा दूषित या विकृत आहार के कारण इस उम्र तक ब्रह्मचर्य का पालन असंभव सा ही दिखाई पड़ता है। विकास, सोपान एवं ज्ञान-विज्ञान के चरमोत्कर्ष पर पहुँचने के पश्चात् भी यौन शिक्षा का सर्वथा अभाव ही है। इन्हीं कारणों से जीवन की अप्रगल्भावस्था में ही काम वासना का बीज अंकुरित होकर युवकों में यौन विकृतियाँ जन्म दे रहा है जिसके कारण वे जीवन निर्माण में सहायक इस मूल्यवान समय का उचित उपयोग न करके इसी चिन्ता में डूबे हुए हैं कि यौन अक्षमता को कैसे दूर किया जाए। अनेक बार तो विवाहोपरान्त सम्बन्धों के विच्छेद में भी यौन सम्बन्धी अक्षमता ही मूल कारण पाया जाता है। अनेक स्त्रियों द्वारा विवाहेतर सम्बन्धों का भी मूल कारण पति द्वारा संतुष्ट नहीं किया जाना होता है।


अज्ञान के कारण तथा शरीर की इस प्राकृतिक आवश्यक मूलभूत शक्ति का अप्राकृतिक तरीकों से शमन अनेक यौन विकृतियों को जन्म देता है । यौन शिक्षा के अभाव एवं अनैतिकता तथा अमर्यादित व्यवहार के कारण होने वाले यौन प्रदूषण के युग में वाजीकरण की उपादेयता आज के परिप्रेक्ष्य में और भी महत्त्वपूर्ण हो गई है। युवकों की एक बहुत बड़ी संख्या आज यौन समस्याओं से ग्रसित है। स्वप्न में वीर्य स्खलन, मूत्र के साथ धातु निकलना, तथा शीघ्रपतन जैसी बीमारियों से ग्रसित है। स्वप्न में प्रायः वीर्य स्खलन, मूत्र के साथ धातु (वीर्य) का क्षरण पतन जैसी समस्याओं को लेकर ही अधिकांश युवक चिकित्सकीय परामर्श लेते हैं। युवक जननेन्द्रिय उत्थान में हीनता व नसों की उभार की समस्या से ग्रसित होते हैं। एक ऐसा भी देखने में आता है जिनमें कोई कमी नहीं होती लेकिन पूर्व में किये गये अप्राकृतिक कत्यों के कारण उनके मन में एक हीन भावना बनी रहती है, जो उन्हें मानसिक रूप से कमजोर कर देती है। इन सभी में सुप्तावस्था के दौरान रात्रि में या प्रातःकाल जागने पर जननेन्द्रिय में पूर्ण रूप से उत्थान होता है। अतः इनमें कोई भी शारीरिक खराबी नहीं होती है। इस प्रकार के युवक प्रायः किन्हीं मानसिक कारणों या यौन सम्बन्धों में अथवा लैंगिक दृष्टि से स्वयं को हीन समझते हैं।


भ्रम से ग्रसित युवा इन सबके प्रति अनावश्यक तथा अत्याधिक रूप से सजग होने के कारण सशंकित होकर नित्य नये-नये चिकित्सकों, ठगने वाले तथा कथित नीम-हकीमों, सेक्स विशेषज्ञों आदि से परामर्श लेते रहते हैं। कई बार तो ये ठगों के चंगुल में फंस जाते हैं और  अन्त में पछताते हैं। किंतु वाजीकरण के उचित उपयोग से इन युवाओं को उनकी समस्याओं से निश्चित रूप से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

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